संवाददाता: कुमार विवेक; नमस्कार भारत

 बिहार में 12 फरवरी को एनडीए बहुमत सिद्ध कर पाएगी या महागठबंधन सरकार बनाएगी। इस पर सस्पेंस बरकरार है। सियासी तिकड़म के बीच राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि जदयू को बहुमत नहीं, फिर भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सीएम की कुर्सी 18 सालों से संभालते आ रहे हैं। कुछ तो ख़ास है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सियासी दांव से हर कोई वाक़िफ है, जिस दल (जदयू) ने कभी बहुमत का आंकड़ा नहीं छुआ लेकिन उस पार्टी के नेता मुख्यमंत्री बनते आ रहे हैं। ऐसे में यह कहना ग़लत तो नहीं कि अनय दलों के नेताओं के मुकाबले में नीतीश कुमार में स्पेशल क्वालिटी है।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को राजद नेता सियासत का चाणक्य बताते रहे हैं। केंद्र की सियासी फ़िज़ा बदलने का दंभ भरने वाले दिग्गज नेता भी नीतीश कुमार के सियासी दांव से चित हो जाए, तो इससे ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 12 फरवरी को क्या खेला मुमकिन है?

बिहार के मौजूदा सियासी समीकरण में सिर्फ 45 विधायकों के साथ सीएम नीतीश कुमार ने बिहार की दो बड़ी पार्टियों के साथ अपनी शर्तों पर सरकार बना ली। इससे उनके सियासी क़द का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। बिहार में अभी सियासी खेला ज़रूर बाकि है, लेकिन सीएम नीतीश कुमार के पास भी तो कुछ दांव ज़रूर ही होगा?

सीएम नीतीश कुमार ने दिल्ली दौरे के दौरान ही बिहार की बदली हवा को लेकर अपना दूसरा प्लान भी तैयार कर लिया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि नीतीश कुमार ने भाजपा  की बड़े नेताओं से मुलाक़ात कर विधानसभा भंग करने के दांव पर सहमति बना ली है।

दिल्ली से बिहार लौटने के बाद सीएंम नीतीश कुमार ने मीडिया से बात करतें हुए साफ लफ्ज़ों में खेला होने से इंकार कर दिया था। ऐसे में नीतीश कुमार का दांव काम करता है या महागठबंधन अपना परचम लहराती है, यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल संभावनाओं की सियासत जारी है।

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