संवाददाता: सिद्धार्थ कुवंर, नमस्कार भारत

रंगमंच एक ज़िद है इसे साफ तौर पर 18 और 19 मई को लगातार दो दिनों तक मुंबई के रंगदर्शकों  ने बड़े ही करीब से उस वक्त महसूस किया जब अपनी गंभीर बीमारी GBS से पूरी तरह ठीक न होने के बावजूद अपनी रंग संस्था प्रासंगिक की दिल्ली की टीम के साथ सुपरिचित रंगकर्मी, नाटककार आलोक शुक्ला ने शहर में अपने दो मशहूर नाटक “उसके साथ” और “ख्वाब” का मंचन किया ।

उनकी टीम ने सबसे पहले 18 तारीख शनिवार शाम 7 बजे  मुकेश छाबड़ा कास्टिंग कम्पनी के आराम नगर -2 स्थिति स्टूडियों में महिलाओं की सामाजिक दुर्दशा पर आधारित करीब एक घंटे के द्वी पात्रीय नाटक  “उसके साथ” का मंचन किया। ये नाटक 1997 में मुंबई में लेखक के सामने ही घटी एक सत्य घटना पर आधारित था जहाँ एक भिखारन बीच सड़क पर बच्चा पैदा कर रही होती है। इसी घटना को केन्द्र में रखकर  एक ऐसी कहानी नाटक में दिखाई गई है  जहाँ एक लड़की के पूरे जीवन में उसके साथ हो रहे अमानवीय अत्याचारों को दिखाते हुए समाज से देश की बेटी के साथ हो रहे कुकर्त्यों के खिलाफ खड़े होने का आव्हान किया जाता है।

इस नाटक में जानी मानी अभिनेत्री  रुमा रजनी के साथ स्वयं आलोक शुक्ला ने भी बेहतरीन अभिनय किया।

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इसके बाद बुजुर्गों की समाजिक  दुर्दशा पर आधारित एक घंटे के एकल पात्रीय नाटक ख़्वाब का मंचन किया गया।

इस नाटक में एक ऐसे बुजुर्ग की कहानी दिखाई गई है जिसका ख़्वाब उसके अपने बच्चों की खुशी होती है और वो पूरे नाटक में बातें भी इसी की करता है लेकिन अंत में ये सच्चाई  खुलती है कि वास्तव में वो एक वृद्धाश्रम में है और अपने पुराने दिनों को याद कर रहा होता है जहाँ उसे उसके अपने ही बच्चों ने घर से निकाल कर वृद्धाश्रम में डाल दिया होता  है।

इस नाटक के केंद्रीय पात्र को जर्बरदस्त तरीके से स्वयं आलोक शुक्ला ने अभिनीत किया । जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

इसके बाद दूसरे दिन रविवार 19 मई की शाम 5.30 चित्र नगरी संवाद मंच गोरेगांव वेस्ट में महिलाओं की सामाजिक दुर्दशा पर आधारित  करीब एक घंटे के द्वी पात्रीय नाटक  “उसके साथ” का ऐसा भाव पूर्ण मंचन किया कि  सभी सुधी दर्शकों की आँखें भर आईं। वहीं फिर देर शाम 8. 30 बजे नाट्य किरण मंच के आराम नगर -2 स्थिति माँ स्टूडियो में बुजुर्गों की समाजिक  दुर्दशा पर आधारित एक घंटे के एकल पात्रीय नाटक ख़्वाब का मंचन किया। जहाँ रंग दर्शक आलोक शुक्ला की जिजविषा को देखकर अचंभित होते रहे।

इन दोनों नाटकों का लेखन निर्देशन एवं परिकल्पना आलोक शुक्ला की थी। संगीत अभ्युदय मिश्रा ने दिया था तो सहयोगी के रूप में विजय लक्ष्मी थीं जिन्होंने उसके साथ नाटक में डॉक्टर और नर्स की सहयोगी भूमिका भी निभाई ,ऐसी ही अंतरात्मा एवं अटैंडेट की सहयोगी भूमिका अभ्युदय मिश्रा ने नाटक ख्वाब में निभाई ।

दोनों ही नाटकों में प्रकाश व्यवस्था को निशांत सिंह ने बखूबी संभाला तो मंच व्यवस्था को प्रताप सिंह ने बड़े ही शानदार तरीके से निभाया। नाटकों की वेशभूषा नीतू शुक्ला की थी।

गौरतलब है कि 2 जून 2020 को GBS अटैक के चलते आलोक शुक्ला का गले के नीचे का पूरा हिस्सा मृत हो गया था उसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने नाट्य लेखन को अपनी पत्नी और बच्चे की मदद से जारी रखा । इस दौरान उनका पहला सात नाटकों का संग्रह “”ख्वाबों के सात रंग” आया, उसके बाद उनके साढ़े तीन दशकों का रंग संस्मरण “एक रंगकर्मी की यात्रा ” आया तो अभी हाल उनके पांच नाटकों का संग्रह “पंचरंग” आया और जैसे ही उनके शरीर में चलने फिरने की कुछ जान आई तो इसी साल 22 जनवरी से उन्होंने नाटकों के मंचन करने की शुरुआत की तो उसके बाद से वे लगातार मंचन कर रहे हैँ।

बता दें कि ये पूरी दुनिया में एक अलग ही उदाहरण होगा जहाँ कोई इस हालत से जुझते हुए नाट्य कर्म कर रहा हो।

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