संवाददता: आलोक शुक्ला, नमस्कार भारत
शुक्रवार शाम एनएफडीसी में एक स्पेशल स्क्रीनिंग में 29 मार्च को रिलीज हुई फिल्म ‘बंगाल 1947’, प्रदर्शित की गई ।फिल्म के टाइटल से ही साफ़ पता लगता है कि फ़िल्म की कहानी विभाजन के समय की हैं। फ़िल्म की कहानी में कुछ ऐसी हकीकत हैं जिनको बहुत बेबाकी से दिखाने की कोशिश की गई हैं जो आपको कहीं भी देखने, सुनने को नहीं मिलेगी।फिल्म में विभाजन के उस त्रासद दौर में बंगाल में क्या कुछ घट रहा था इसको पूरी ईमानदारी से फ़िल्म के लेखक-निर्देशक आकाशादित्य लामा ने दर्शाने का प्रयास किया है और कहना ही होगा कि यदि कुछ तकनीकी पक्षों को नज़र अंदाज़ कर दिया जाए तो ये एक ऐसी फिल्म है जिसे हर उस दर्शक को देखनी चाहिए जो एक अच्छे कंटेंट पर बनी फ़िल्म को देखने की चाहत रखता है। इसी के साथ ये उस आम आदमी की भी फ़िल्म है जो हिन्दू वाद या मुस्लिम वाद के बीच फंसा हुआ महसूस करता है, वो सच्चाई से अपनी बात कहना चाहता है और उसी सच्चाई से जीना चाहता है।
फिल्म में विभाजन के दौर में धार्मिक भावनाओं के उद्देलन के बीच जात पात के कुचक्र में फंसे समाज में एक उच्च वर्ग के यूवक मोहन और एक निम्न जाति की युवती शबरी के बीच प्रेम को खुबसूरती से दर्शाया गया है जो एक प्रेम त्रिकोण में कुछ उसी तरह फंसता है जैसे अब्दुल नाम का मुस्लिम किरदार जो निडर होकर सच्ची बात कहता हुआ धर्म के ज्वार के कुचक्र में फंस जाता है और फिर शुरु होते हैं दंगे जिसमें कोई नहीं बचता, बचता है तो फ़िल्म का नायक मोहन जो दंगों में मरे हुए लोगों को अकेले धर्म के हिसाब से जला या दफना रहा होता है। इसके बाद का मार्मिक क्लाइमैक्स ऐसा है जो आपको चौकाने के साथ आपकी आंखों को भिगो देता है हालांकि शुरुआत में फिल्म की सुस्त चाल आपको थोड़ा असहज कर सकती है लेकिन अंत तक आते,आते आप फिल्म के साथ घुल मिल जाते हैं तो वहीं निर्देशक आकाशादित्य लामा के अपने नाटक “शबरी के मोहन” पर बनाई इस फिल्म में उनके चुटीले और समाज पर प्रहार करते संवाद झकझोरते रहते हैं।
फ़िल्म में लीड किरदार मोहन में अंकुर अरमम नाम के नए एक्टर ने अपनी पूरी जान लगा दी है तो शबरी के लीड किरदार में नई लड़की सुरभि ने भी पूरा न्याय किया है। अब्दुल के रोल में ओमकार दास जमते हैं और ऐसे ही तवायफ के एक अहम रोल में देवोलीना भट्टाचार्जी खूब जमती हैं। ऐसे ही एक अहम रोल में वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल रस्तोगी अपनी उपस्थित से गरिमा बढ़ाते हैं। अन्य किरदारों में फलक राही , सोहिला कपूर, आदित्य लाखिया, योगेंद्र चौबे, प्रमोद पवार, अतुल गंगवार, कृष्णा श्रीवास्तव और विक्रम आदि सबने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करने का प्रयास किया है।
फ़िल्म में “मिलन होगा कब जाने” और “चलो सखी सौतन के घर चलिहे ” दो गाने हैं और दोनों ही काफी खूबसूरत बन पड़े हैं। फिल्म का सुमधुर संगीत अभिषेक रे ने दिया है। फ़िल्म में मिलन होगा कब जाने में मेल लीड की आवाज खुद अभिषेक रे ने दी है जबकि फीमेल लीड आवाज प्रतिभा सिंह बघेल की है। गीतकार दिव्व्येश मोगरा हैं।
“चलो सखी सौतन के घर चलिहे ” गाना हर मामले में फ़िल्म का सबसे अच्छा प्रदर्शित गाना है जिसे देवलीना पर फिल्माया गया है लेकिन इस गाने में फिल्म में चल रहे तनाव भरे दृश्यों को जिस तरह पिरोया गया है वो काफी अच्छा है। इसे पल्लवी और श्याम जोशी ने गाया है। संगीत देने के साथ इसे रिअरेंज किया है प्रियव्रत पाणिग्रही ने।
फ़िल्म का साहसिक निर्माण सतीश पांडेय, ऋषभ पांडेय और खुद निर्देशक आकाशादित्य लामा ने किया है। उनके इस साहस को सराहने के लिए सुधी दर्शकों को एक बार जरुर इस फिल्म को देखने जाना चाहिए वर्ना कोई भी लेखक, निर्देशक, निर्माता अच्छे कंटेंट की फिल्म बनाने से डरेगा और जहां तक कमियों की बात है तो किसी भी काम में हज़ार निकाली जा सकती हैं लेकिन सच ये है कि फिल्म के एक दृश्य में आग भी जलाकर शूट करना हो तो हज़ार जतन करने पड़ते हैं इसलिए मेरा यही कहना है कि लेखक निर्देशक और निर्माता ने एक अच्छे कंटेंट की फिल्म बनाकर आग तो सुलगा दी है अब बस आपको जाकर ( देखकर) हवा देकर जलाना है।
( समीक्षक वरिष्ठ रंगकर्मी लेखक निर्देशक और पत्रकार हैं}
