संवाददाता: हर्षिता चौहान, नमस्कार भारत

Renaissance of culture: जब हम भारत का नाम लेते हैं, तो हमारे सामने सिर्फ एक नक्शा नहीं आता, बल्कि एक पूरी जीवनशैली उभरती है — जहां मंदिरों की घंटियाँ, मस्जिदों की अज़ान, गुरुद्वारों का लंगर और चर्च की प्रार्थनाएं एक सुर में गूंजती हैं। भारत केवल भौगोलिक रूप से विविध नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से एक गहराई लिए हुए है। यहां की संस्कृति किसी किताब में सीमित नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में बसी हुई है।

Renaissance of culture: वो भारत, जिसे देखने दुनिया आती थी –

भारत की आध्यात्मिकता और विविधता को जानने के लिए सदियों से विदेशी यात्री यहाँ आते रहे हैं। 5वीं शताब्दी में फा-हिएन ने इसे सहिष्णु और धार्मिक रूप से समर्पित देश बताया। 11वीं शताब्दी में अल-बिरूनी ने भारत के ज्ञान-विज्ञान और दर्शन से प्रभावित होकर इसे महान सभ्यता कहा। मौर्यकाल के दौरान मेगस्थनीज़ ने भारत की प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक संतुलन की सराहना की — ये सब गवाही देते हैं कि भारत हमेशा आकर्षण का केंद्र रहा है।

Renaissance of culture: सांस्कृतिक चोट और गुलामी की धुंध –

मुग़लों के आगमन के बाद से लेकर अंग्रेज़ों की नीति तक, भारत की आत्मा को दबाने के प्रयास लगातार हुए। अंग्रेज़ों ने खासतौर पर हमारी शिक्षा प्रणाली को बदला ताकि हम अपने इतिहास को ही तुच्छ समझें। मैकोले की शिक्षा नीति ने भारतीय भाषाओं, संस्कृति और साहित्य को शिक्षा के दायरे से बाहर कर दिया। यह वह समय था जब भारत ने अपनी जड़ों से दूरी बनानी शुरू की — जानबूझकर और रणनीति के तहत।

अब भारत फिर से खुद को जान रहा है –

आज भारत एक बार फिर अपनी आत्मा की ओर लौट रहा है। यह सिर्फ धरोहरों की मरम्मत नहीं है, बल्कि स्मृतियों और पहचान का पुनरुद्धार है। मंदिरों, किलों, और पौराणिक स्थलों का पुनर्निर्माण इस बात का संकेत है कि हम अपनी मिट्टी की खुशबू को फिर से महसूस करना चाहते हैं। भारत अब अपने इतिहास को गर्व के साथ जीने की ओर बढ़ रहा है, न कि शर्म के साथ छुपाने की ओर।

उत्तर प्रदेश का धरोहर अभियान: PPP मॉडल की शुरुआत –

13 जुलाई 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार ने “धरोहर संरक्षण एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान अभियान” की शुरुआत की। इसमें 11 ऐतिहासिक स्थलों को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत पुनर पुर्नजीवित किया जा रहा है। [Talbehat Fort, Rangarh Fort, Alambagh Bhawan आदि] को चिन्हित कर उनकी पहचान, संरक्षण और प्रचार का कार्य शुरू हुआ है। इसका उद्देश्य केवल धरोहर बचाना नहीं, बल्कि जनता के साथ उन्हें जोड़ना है।

Renaissance of culture: सांस्कृतिक परियोजनाएँ जो आत्मा को फिर से जगाती हैं –

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर (वाराणसी), राम मंदिर (अयोध्या), महाकाल लोक (उज्जैन), और केदारनाथ पुनर्निर्माण जैसे प्रोजेक्ट केवल धार्मिक स्थलों का सौंदर्यकरण नहीं हैं। ये भारत की आत्मा से फिर से जुड़ने की प्रक्रिया हैं। ये प्रोजेक्ट्स हमारे विश्वास, हमारे त्योहारों और हमारी सांस्कृतिक एकता को फिर से सार्वजनिक जीवन में ला रहे हैं।

रोजगार, पर्यटन और क्षेत्रीय विकास –

यह अभियान केवल संस्कृति को नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था को  पुर्नजीवित कर रहा है। बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाकों में heritage-tourism से रोजगार के नए अवसर खुल रहे हैं। स्थानीय कलाकारों को मंच मिल रहा है, और लोक संस्कृति को प्रोत्साहन मिल रहा है। साथ ही, स्थानीय उत्पादों को प्रमोट करने से आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी एक मजबूत कदम बढ़ रहा है।

एक जीवित संस्कृति की वापसी –

धरोहरों की मरम्मत केवल दीवारों की चमक नहीं लौटाती, वह हमारी लोककथाओं, लोकगीतों और परंपराओं को फिर से ज़िंदा करती है। Tikait Rai Baradari से लेकर Mastani Mahal तक, हर ईंट, हर दरवाज़ा कोई कहानी कहता है। स्थानीय कलाकारों, दस्तकारों और इतिहासवादियों को साथ लेकर restoration किया जा रहा है — जिससे यह प्रयास एक ‘दृश्य’ नहीं, बल्कि एक ‘अनुभव’ बन सके।

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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: गर्व और गरिमा का प्रतीक –

आज का राष्ट्रवाद हिंसक न होकर, सांस्कृतिक है। यह राष्ट्रवाद किसी पर हावी होने का नहीं, बल्कि खुद को पहचानने और अपनाने का प्रतीक है। जब हम अपने संगीत, साहित्य, व्यंजन और भाषाओं को सम्मान देते हैं — तब असली राष्ट्रवाद फैलता है। यह भारत को फिर से आत्मबल से भरने वाला राष्ट्रवाद है, जहां संस्कृति गर्व बन जाती है।

 संस्कृति से जुड़ते भारतवासी, और उससे प्रभावित विश्व –

भारत की ये सांस्कृतिक पहलें अब न केवल देशवासियों को, बल्कि दुनिया भर के पर्यटकों को भी आकर्षित कर रही हैं। आज विदेशी सैलानी सिर्फ देखने नहीं आते — वे भारत को समझना चाहते हैं, उसकी आत्मा को महसूस करना चाहते हैं। जब वे दरबारियों के गीत सुनते हैं या किलों में चित्रकारी देखते हैं, तो उन्हें भारतीय संस्कृति की समृद्धि का अनुभव होता है। इसका प्रभाव यह है कि देश के नागरिकों में भी अपने इतिहास और संस्कृति को लेकर जागरूकता और गर्व बढ़ रहा है।

 निष्कर्ष: जब जड़ें मजबूत हों, उड़ान स्वाभाविक होती है –

आज भारत केवल इमारतें नहीं संवार रहा — वह अपनी आत्मा को फिर से जगा रहा है। यह पुनरुत्थान एक नई चेतना ला रहा है — जो देश के युवाओं को अपनी परंपराओं से जोड़ रहा है, रोजगार के अवसर दे रहा है, और भारत को वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक महाशक्ति बना रहा है। जब हम अपनी जड़ों से जुड़ते हैं, तो हमारी उड़ान न केवल ऊँची होती है — बल्कि अर्थपूर्ण भी होती है।

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