वरिष्ठ संवाददाता आलोक शुक्ला
साहित्य अकादेमी ने हिंदी साहित्य जगत के प्रख्यात कथाकार श्रीलाल शुक्ल की जन्मशती के अवसर पर एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें साहित्यकारों, विद्वानों, विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत अकादेमी द्वारा निर्मित और वरिष्ठ निर्देशक शरद दत्त द्वारा निर्देशित श्रीलाल शुक्ल पर केंद्रित वृत्तचित्र के प्रदर्शन से हुई। इस वृत्तचित्र ने उनके जीवन, लेखन यात्रा और रचनात्मक दृष्टिकोण को जीवंत रूप से प्रस्तुत किया।


माधव कौशिक – व्यंग्य ही सामाजिक विद्रूपता का सशक्त माध्यम
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि जब सामाजिक विद्रूपताओं को उनकी पराकाष्ठा में व्यक्त करना हो, तो व्यंग्य और फैंटेसी जैसे माध्यम ही सबसे उपयुक्त साबित होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रीलाल शुक्ल ने अपने लेखन में व्यंग्य शैली को केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज की गहरी सच्चाइयों को उजागर करने के लिए अपनाया। माधव कौशिक ने यह भी कहा कि शुक्ल जी के उपन्यास समय से कहीं आगे की रचनाएँ हैं, जिनकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है और इन्हें वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है।
साहित्य समाज की सच्चाई का दर्पण – के. श्रीनिवासराव
साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि श्रीलाल शुक्ल का साहित्य हमें समाज के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है। उनके व्यंग्यपूर्ण लेखन से न केवल हँसी उत्पन्न होती है, बल्कि यह समाज के दोषों पर गहरी चोट भी करता है और सुधार की प्रेरणा देता है। उन्होंने माना कि शुक्ल जी का साहित्य हर पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक की तरह है, जिसमें यथार्थ और हास्य का अद्भुत संतुलन है।
व्यक्तित्व और संस्मरण
संगोष्ठी में वरिष्ठ साहित्यकार गोविंद मिश्र ने श्रीलाल शुक्ल के साथ बिताए गए पलों को याद करते हुए कहा कि वे मस्ती और अल्हड़ता से भरपूर व्यक्ति थे। उनका स्वभाव खुला और हंसमुख था, और वे हर व्यक्ति से सहजता से जुड़ जाते थे। रामेश्वर राय ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि श्रीलाल शुक्ल के लेखन की गहराई को समझने के लिए पारंपरिक आलोचना के औज़ार पर्याप्त नहीं हैं। उनके उपन्यास आज़ादी के बाद के भारत की टूटती उम्मीदों और जटिल सामाजिक यथार्थ का आईना हैं।
श्रीलाल शुक्ल की कनिष्ठ सुपुत्री विनीता माथुर ने अपने पिता के बारे में कई संस्मरण साझा किए। उन्होंने बताया कि पिताजी को शास्त्रीय संगीत और शस्त्रों का गहरा शौक था। वे खेलों में भी दिलचस्पी रखते थे और परिवार के हर सदस्य को विनम्रता, सरलता और उदारता का पाठ पढ़ाते थे।
व्यंग्य और उपन्यास पर विचार
श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व पर केंद्रित सत्र की अध्यक्षता करते हुए ममता कालिया ने कहा कि वे न केवल उत्कृष्ट लेखक थे, बल्कि बेहद अच्छे इंसान भी थे। उनकी बातें चुटीली और हास्य से भरपूर होती थीं, जो हर किसी के चेहरे पर मुस्कान ला देती थीं। शैलेंद्र सागर ने अपनी पहली मुलाकात और जीवनभर के संबंधों को याद करते हुए कहा कि वे कभी अपने विचार दूसरों पर नहीं थोपते थे और सबके दृष्टिकोण का सम्मान करते थे।
अखिलेश ने उन्हें युवा ऊर्जा से परिपूर्ण व्यक्ति बताया, जो हमेशा नए रचनाकारों को पढ़ते और उन्हें प्रोत्साहित करते थे। उपन्यासों पर चर्चा करते हुए नित्यानंद तिवारी ने कहा कि ‘रागदरबारी’ का संपूर्ण रचनाबंध व्यंग्य का है। यह केवल व्यंग्य उपन्यास नहीं, बल्कि व्यंग्य और उपन्यास दोनों की संज्ञाओं का मेल है। विनोद तिवारी ने इसे औपन्यासिक ढाँचे को तोड़ने वाला और डिस्टोपिया का प्रतिनिधि उपन्यास बताया। वहीं, प्रेम जनमेजय ने ‘विश्रामपुर का संत’, ‘मकान’ और ‘आदमी का जहर’ जैसे उनके अन्य प्रमुख उपन्यासों पर अपने विचार व्यक्त किए।
उपन्यासेतर साहित्य पर विमर्श
श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासेतर साहित्य पर चर्चा करते हुए रेखा अवस्थी ने कहा कि उनकी कहानियाँ अतिविशिष्ट हैं, जिनमें नई प्रवृत्तियों की नींव रखी गई। उनका मानना था कि व्यंग्य एक शैली है, कोई विधा नहीं, और इसी कारण उनका साहित्य अधिक प्रभावी बन जाता है। सुभाष चंदर ने उन्हें हिंदी के पाँच श्रेष्ठ व्यंग्यकारों में शामिल करते हुए उनकी कई चर्चित कहानियों का उल्लेख किया। राजकुमार गौतम ने उनके निबंध, कहानियों, रेडियो लेखन और साक्षात्कारों पर विस्तार से अपने विचार रखे।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति
कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादेमी के उपसचिव देवेंद्र कुमार देवेश ने किया। इस अवसर पर श्रीलाल शुक्ल के परिवार के सदस्य, प्रमुख साहित्यकार, शोधार्थी, विद्यार्थी और बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। पूरे आयोजन में श्रीलाल शुक्ल के व्यक्तित्व, कृतित्व और व्यंग्य साहित्य में उनके योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई।

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